लखीमपुर खीरी- चिकित्सा क्षेत्र में परोपकार और अंगदान की भावना को बढावा देने के उद्देश्य से स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय देवकली खीरी में मेडिकल एल्ट्रिज्म ( परोपकारार्थमिदं शरीरम्) विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन का भव्य आगाज शनिवार को हुआ। सम्मेलन का शुभांरम अतिथि के रूप में सदर विधायक योगेश वर्मा, श्रीनगर विधायक मंजू त्यागी, भाजपा जिलाध्यक्ष अरविंद गुप्ता, जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह, प्रधानाचार्या डॉ० वाणी गुप्ता, सीएमओ डॉ० संतोष गुप्ता, सीएमएस डॉ० आरके कोली, सीएमएस डॉ० अमित कुमार गुप्ता द्वारा सामूहिक रूप से दीप प्रज्जवलन और माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। अतिथियों का स्वागत प्रधानाचार्य मेडिकल कॉलेज डा० वाणी गुप्ता द्वारा पुष्पगुच्छ देकर किया गया।
स्वागत समारोह के बाद अपने उद्बोधन में प्रधानाचार्य डा० वाणी गुप्ता ने बताया कि मेडिकल एल्ट्रिज़्म (परोपकारार्थमिदं शरीरम्) जैसे सामाजिक और परोपकारी भाव वाले विषय पर होने वाला यह उत्तर प्रदेश का पहला सम्मेलन है, जिसमें देशभर के विशेषज्ञ चिकित्सक अपने-अपने विषय पर अपने विचार व्यक्त करेंगे जो इस विषय पर सामाजिक क्रांति के लिए एक प्रेरणा साबित होगा। उन्होंने बताया कि एक युवा रोगी हरीश राणा थे जिन्हें मस्तिष्क की गंभीर चोट लगी थी, लंबे इलाज के पश्चात ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था। परिवार द्वारा न्यायालय से इच्छा मृत्यु के अनुरोध के बाद मिली अनुमति से परिवार ने मृत्यु पश्चात हरीश राणा के अंग और ऊतक दान की इच्छा व्यक्त की, जोकि देश में अंगदान का एक बड़ा उदाहरण व प्रेरणा बना। सम्मेलन में 567 प्रतिभागी भाग ले रहे है, जिन्हें अंगदान और ऊतकदान के वैज्ञानिक नीतिगत एवं व्यावहारिक पहलूओं के बारे में विशेषज्ञ जानकारी देगें।
यूनाइटेड किंगडम की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल से राष्ट्रीय सम्मेलन में पहुंचे डॉ० अभिषेक रे ने छोटी आंत व बडी आंत के ट्रांसप्लाट को लेकर विस्तार से जानकारी दी उन्होंने कहा कि यह एक जटिल प्रक्रिया है परंतु इसमें सामाजिक सहभागिता से कई जीवन बच सकते है।
एसजीपीजीआई लखनऊ के प्रोफेसर डा० जिया हाशिम ने बताया की ब्रेन डेड मस्तिष्क ब्रेन स्टेम के सभी कार्यों के अपरिवर्तनीय रूप से बंद होना दर्शाता है। वेंटिलेटर सपोर्ट से हदय की गतिविधि जारी रखने के बावजूद व्यक्ति कानूनी रूप से मृत्यु के समान माना जाता है।
एसजीपीजीआई लखनऊ के प्रोफेसर डा० राजेश हर्षवर्धन ने प्रमुख कानूनी अवधारणओं जैसे लापरवाही, लाईबिलिटी, दोषपूर्ण दायित्व को विस्तार से समझाया, जिसमें डॉक्टर रोगी सम्बन्ध सहमति और गोपनीयता निहित है। चरक अस्पताल लखनऊ से पधारे डा० विष्णु शंकर शुक्ला ने किडनी प्रत्यारोपण में चुनौतियों और जीवन दाताओं की उपलब्धता विषय पर जानकारी साझा की। उन्होंने किडनी प्रत्यारोपण के क्षेत्र में आने वाली बाधाएं और जीवित डोनर के चयन और उपलब्धता से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू साझा किए।
मेदांता लखनऊ से आए डा० अंशुल गुप्ता ने चिकित्सकों के लिए बोन मैरो (अस्थि मज्जा) प्रत्यारोपण को लेकर मार्गदशन किया। बुनियादी जानकारी और जटिलताओं के साथ मरीजों को समय पर सही परामर्श के लिए प्रेरित किया। डा० अरूणा सिंह ने परोपकार को ईनाम की अपेक्षा के बिना दूसरों की मदद करने के स्वैच्छिक कार्य के रूप में परिभाषित किया।
उन्होनें बताया कि न्यूरोफिजियोलॉजी और व्यवहार विज्ञान के समकालीन शोध ने परोपकार को एक मानवीय रूप में निहित किया है।
मोहन फाउंडेशन (मल्टीपल ऑर्गन हार्वेस्टिंग) जो कि भारत में पंजीकृत मृत अंगदान और प्रत्यारोपण के क्षेत्र में कार्य करती है, के द्वारा प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के एमबीबीएस प्रशिक्षुओं के लिए कार्यशाला का आयोजन भी किया गया।
मेडिकल कालेज में मेडिकल एल्ट्रिज्म (परोपकारार्थमिदं शरीरम्) विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को नाटो (राष्ट्रीय अंगदान एवं ऊतक प्रत्यारोपण संस्था) द्वारा सराहा गया है वहीं एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) द्वारा शुभाकामनाओं के साथ क्रेडिट भी दिया गया है जिसका राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खासा महत्व है। इसी के साथ उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री / स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक द्वारा शुभकामना संदेश भेजा गया है। नवागत जिलाधिकारी अजंनी कुमार सिंह ने भी कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए शुभकामनाएं दी है।
इसी के साथ सम्मेलन में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ० मोनीशा खरे, डा० आकांशा वर्मा, डा० मनोज शर्मा ने भी अपने-अपने विषय पर अंगदान परोपकार से सम्बन्धित विचारों को व्यक्त किया।
*किराये की कोख से घर हो रहे रोशन*
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग राजर्षि दशरथ स्वायत्त राज्य चिकित्सा महाविद्यालय अयोध्या की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ० वंदना गुप्ता ने बताया कि सरोगेसी (किराये की कोख) सहायक प्रजनन तकनीकों में एक महत्वपूर्ण प्रगति के रूप में उभरी है, जो गर्भधारण करने में असमर्थ जोड़ों के लिये आशा की एक किरण लाई है। आज समाज में तमाम निसंतान परिवारों ने इसे अपनाकर संतान का सुख प्राप्त किया है। यह विधा चिकित्सा का एक परोपकारी रूप भी है।
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