नई दिल्ली:* ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग का सबसे बड़ा फायदा किसे हुआ है? कुछ लोग मानते हैं कि युद्ध में भले ही ईरान बर्बाद हो गया हो, भारी तबाही का शिकार बना है, लेकिन अमेरिका के सामने 50 से ज्यादा दिनों तक जंग में टिककर उसने जीत हासिल कर ली. ये दलील अपनी जगह ठीक है, लेकिन युद्ध का असली विनर अमेरिका बना है. अमेरिका को जो चाहिए था, वो उसे मिल गया है. इस युद्ध की वजह से अमेरिका ने ग्लोबल ऊर्जा कॉरिडोर को पूरी तरह से बदल दिया है. अब एनर्जी का सेंटर मिडिल ईस्ट से शिफ्ट होकर अमेरिका पहुंच गया है. अगर सिर्फ भारत के नजरिए से बात करें तो भारत की ऊर्जा निर्भरता खाड़ी देशों से हटकर अमेरिका की ओर बढ़ गई है. ईरान युद्ध ने वो कर दिया है, जो ट्रंप भारत के साथ ट्रेड डील के जरिए करना चाहते थे.
*भारत LPG के लिए अमेरिका पर कितना निर्भर है:*
साल 2026 के शुरुआत से पहले तक भारत LPG आयात के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर था. कतर, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई जैसे देशों से भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी गैस आयात करता था, लेकिन युद्ध की वजह से खाड़ी अशांत है, होर्मुज स्ट्रेट को ईरान ने बंद कर रखा है. ऐसे में भारत ने अपने ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए खाड़ी देशों के बजाए अमेरिका की ओर शिफ्ट होने का फैसला किया है. ईरान युद्ध की वजह से जब मिडिल ईस्ट से सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत ने अमेरिका के साथ बड़ी ऊर्जा डील साइन की. भारत ने 19 मार्च तक 176000 टन एलपीजी का आयात अमेरिका से किया, जो आंकड़ा इससे पहले शून्य था. इस डील के तहत भारतीय तेल कंपनियां साल 2026 में अमेरिका से 2.2 मिलियन टन LPG का आयात करेगी, जो उसके कुल एलपीजी खपत का 10 फीसदी होगा. Commodities At Sea (CAS) डेटा का मुताबिक अमेरिका से आयात में बढ़ोतरी ने गल्फ देशों के सप्लायरों की जगह ले ली है. अगर आंकड़ों की बात करें तो साल 2024-25 में भारत ने अमेरिका से 2.07 करोड़ टन एलपीजी का आयात किया था. एक महीने बाद, मार्च में पूरी पिक्चर बदल गई. एक हफ्ते के भीतर अमेरिका से गैस आयात में जबरदस्त बढ़ोतरी हो गई.
*अमेरिका से गैस खरीद की क्या मजबूरी:*
भारत इससे पहले तक अपनी LPG डिमांड को गल्फ देशों से पूरा करता था, जहां से 7 से 8 दिनों में शिपमेंट भारत पहुंचती थी. वहीं अमेरिका से शिपमेंट पहुंचने में 45 दिन का लंबा वक्त लगता है. इसी तरह से रूस और जापान से कार्गों को पहुंचने में 30 से 40 दिन का वक्त लगता है. अब सवाल ये कि अगर अमेरिका से गैस खरीदना इतना मुश्किल है तो भारत क्यों खरीद रहा है ? दरअसल ईरान युद्ध की वजह से सप्लाई बंद हो गया. भारत, जो 100 फीसदी तक एलपीजी के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर था, अचानक से सप्लाई बंद होने लगी. एक हफ्ते में एलपीजी का इंपोर्ट 322,000 टन से घटकर 265,000 टन पर पहुंच गया. अगर भारत दूसरे विकल्प की तलाश नहीं करता तो देश के 33 करोड़ से अधिक एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए भारी मुश्किल खड़ी हो जाती. अब अगला सवाल ये कि क्या सिर्फ यहीं वजह है ?
*भारत से जो चाहते थे ट्रंप, वो ईरान युद्ध में पूरा हो गया:*
पेट्रोलियन प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के डेटा के मुताबिक साल 2027 तक भारत में एलपीजी खपत 34.69 मिलियन टन तक जा सकती है, जो साल 2026 के मुकाबले 4.5 फीसदी अधिक है. इस दौरान भारत 20.82 मिलियन टन एलपीजी का आयात कर सकता है. खाड़ी देशों में युद्ध की वजह से ऊर्जा की आधारभूत संरचना को भारी नुकसान हुआ है. युद्ध खत्म हो भी जाए, तो भी ऊर्जा सप्लाई को पूरी तरह से ठीक होने में लंबा वक्त लग सकता है. ऐसे में भारत अमेरिका से अपना आयात बढ़ा सकता है. खासबात है कि यहीं अमेरिका चाहता भी है. अगर भारत-अमेरिका ट्रेड डील की शर्तों पर गौर करें तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शर्त रखी थी कि भारत तो साल 2030 तक भारत को अमेरिका से 500 अरब डॉलर का ऊर्जा आयात करना होगा, हालांकि बाद में भारत की ओर से आपत्ति दिखाए जाने के बाद अमेरिका ने डील की फैक्ट शीट में इस शर्त में जरूरी बदलाव कर दिए थे. डील में भले ही अमेरिका भारत को नहीं मना पा रहा हो, लेकिन उसकी ख्वाहिश ईरान युद्ध से पूरी हो रही है. यहां ये जरूर देखने वाली बात होगी कि अमेरिका पर ऊर्जा के लिए निर्भरता कितना सही है ?
0 Comments