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युवराज दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मे संस्कृत विभाग द्वारा “दार्शनिक चिंतन में आदि शंकराचार्य का योगदान” विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया

लखीमपुर खीरी, 
युवराज दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लखीमपुर खीरी के संस्कृत विभाग द्वारा “दार्शनिक चिंतन में आदि शंकराचार्य का योगदान” विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से प्रख्यात विद्वानों, प्राचार्यों, प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10 बजे दीप प्रज्ज्वलन, वैदिक एवं लौकिक मंगलाचरण तथा माँ सरस्वती की वंदना के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में अतिथियों का स्वागत, संस्थापक परिचय एवं महाविद्यालय कुलगीत प्रस्तुत किए गए। इसके तुरंत बाद महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. हेमंत कुमार पाल ने मंच पर आकर स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। प्राचार्य जी ने अपने भाषण में आदि शंकराचार्य जी के अद्वैत दर्शन एवं विविधता में एकता पर बल देते हुए कहा कि “उन्होंने हमें यह बताया कि ब्रह्म और जीव में कोई भेद नहीं है।” साथ ही उन्होंने इस आयोजन के सफल आयोजन हेतु संस्कृत विभाग की सराहना की।
इसके पश्चात् संगोष्ठी की रूपरेखा संयोजक डॉ. श्वेतांक भारद्वाज ने प्रस्तुत की। डॉ. भारद्वाज ने इस संगोष्ठी की पृष्ठभूमि साझा करते हुए इसके संचालन में भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद (ICPR) की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया।
बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. अतुल कुमार शुक्ला ने भारतीय चिंतन परंपरा में आदि शंकराचार्य की केंद्रीय स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि परवर्ती साहित्य में उनके विचारों की अनुगूंज सुनाई पड़ती रही है।
इसी क्रम में लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली से पधारे डॉ. सूर्य देव बहुगुणा ने शंकराचार्य जी के एकात्म एवं समन्वय की चेष्टा पर प्रकाश डाला।
इसके बाद प्रो. रामसलाही द्विवेदी ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त की प्रासंगिकता एवं उसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों पर विचार रखे।
मुख्य अतिथि एवं महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) के कुलपति, माननीय प्रो. शिवशंकर मिश्र ने अपने उद्बोधन में शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन की समकालीन जीवन-दृष्टि में महत्ता को रेखांकित किया।
मध्यांतर के पश्चात् आयोजित तकनीकी सत्रों में विद्वानों ने शोधपरक प्रस्तुतियाँ दीं। तकनीकी सत्र के अंत में अंतरजाल के माध्यम से जुड़े जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. राम नाथ झा ने “संत काव्य परंपरा में अद्वैत” विषय पर विद्वतापूर्ण वक्तव्य प्रस्तुत किया।
इस संगोष्ठी में उपस्थित गणमान्य अतिथियों में सबसे पहले प्रोफेसर — प्रो. एस. के पाण्डेय, प्रो. ज्योति पंत, प्रो. सुभाष चंद्रा, प्रो. विशाल द्विवेदी, प्रो. सतनाम, प्रो. मनोज मिश्र, प्रो. नीलम त्रिवेदी, फिर डॉ. — डॉ. इष्ट विभु, डॉ. ओ.पी. सिंह, डॉ. विनोद कुमार सिंह, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. अमित कुमार सिंह, डॉ. आर पी एस तोमर, डॉ. जे एन सिंह, डॉ. मानवेन्द्र यादव, और अंत में श्री — श्री मोहम्मद आमिर, श्री विजय प्रताप सिंह, श्री दीपक कुमार बाजपेयी, श्री रचित कुमार, श्री विनयतोष गौतम, श्री मोहम्मद नज़ीफ, श्री सौरभ वर्मा, श्री योगेश दुबे, श्री अजय कुमार वर्मा के साथ भारी संख्या में छात्र-छात्राएँ, शोधार्थी एवं अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
समापन सत्र में संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया, प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए तथा प्राचार्य प्रो. हेमंत कुमार पाल ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
संगोष्ठी में शंकराचार्य की शिक्षाओं की प्रतिध्वनियाँ न केवल शास्त्रीय विमर्श में बल्कि भक्ति साहित्य और लोक परंपराओं में भी स्पष्ट दिखाई देने की बात उभरकर सामने आई।

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