भारतीय सेना बहुत जल्द एक ऐसी सैन्य तकनीक को मैदान में उतारने जा रही है, जो अब तक दुनिया में किसी भी देश के पास नहीं है। सेना दुनिया के पहले रैमजेट-संचालित 155 मिमी तोपखाने के गोले तैनात करने की तैयारी में है। इस हाई-टेक गोले को आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर बनाया गया है। कहने को ये तोप का गोला है लेकिन इसकी ताकत मिसाइल के जैसी होगी। आसान भाषा में कहें तो एक आम तोप के गोले की रेंज 40 किलोमीटर तक हो सकती है। लेकिन इस गोले की रेंज 80 किलोमीटर तक हो सकती है। यानी कि अगर जम्मू कश्मीर के पूंछ से ये दागा जाएगा तो इस्लामाबाद तक कोहराम मचा सकता है।
*IIT मद्रास और सेना की जुगलबंदी से निकली सुपर टेक्नोलॉजी*
यह प्रोजेक्ट आईआईटी मद्रास और आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड (ATB) की साझेदारी का नतीजा है। इसका मकसद था-ऐसा गोला बनाना जो पारंपरिक आर्टिलरी से कहीं ज्यादा दूर और ज्यादा सटीक वार कर सके। जानकारों के मुताबिक, यह रैमजेट गोला दूसरी तोप के गोलों की तुलना में 30 से 50 प्रतिशत ज्यादा रेंज देने में सक्षम है, जो अपने आप में एक बड़ी तकनीकी छलांग मानी जा रही है।
*पुरानी तोपों से कैसे अलग है ये रैमजेट गोला?*
अब तक तोपखाने के गोले सिर्फ बारूद की ताकत और बैलिस्टिक ट्रैजेक्टरी पर चलते थे। एक बार फायर हुआ और फिर गुरुत्वाकर्षण के भरोसे उड़ता गया। लेकिन रैमजेट-संचालित गोले का मामला अलग है। इसमें फायर होने के बाद भी लगातार थ्रस्ट मिलता रहता है, जिससे यह ज्यादा दूर तक तेज़ रफ्तार में जाता है और टारगेट पर ज्यादा प्रभावी हमला करता है।
*काम कैसे करती है रैमजेट तकनीक?*
रैमजेट (Ramjet) एक एयर-ब्रीदिंग प्रोपल्शन सिस्टम है। जैसे ही 155 मिमी गोला तोप से दागा जाता है, वह सुपरसोनिक स्पीड पकड़ लेता है-यानि मैक 2 से ज्यादा। आगे बढ़ते वक्त आसपास की हवा इसके इनलेट में जाती है, तेज़ गति के कारण वह संकुचित होती है और अंदर मौजूद ईंधन के साथ जलती है। इस दहन से लगातार थ्रस्ट मिलता रहता है, जिससे गोला सामान्य राउंड्स की तुलना में कहीं ज्यादा दूरी तय कर पाता है। अब तक यह तकनीक ज़्यादातर मिसाइल सिस्टम्स में इस्तेमाल होती थी, लेकिन पहली बार इसे तोप के गोले में लागू किया गया है।
*एकेडमिक दिमाग + मिलिट्री की जरूरत = नया हथियार*
इस प्रोजेक्ट को आईआईटी मद्रास के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग और भारतीय सेना के रिसर्च विंग्स ने मिलकर विकसित किया है। यह अकादमिक-डिफेंस पार्टनरशिप का एक मजबूत उदाहरण है, जिसमें कॉन्सेप्ट से लेकर लाइव टेस्टिंग तक का सफर बेहद तेज़ी से तय किया गया। आर्मी टेक्नोलॉजी बोर्ड (ATB) ने इसे आधिकारिक मंजूरी दी है, जो इसके रणनीतिक महत्व को साफ दिखाता है।
*पोखरण टेस्टिंग ने बढ़ाया भरोसा*
राजस्थान के पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में हुए शुरुआती परीक्षणों के नतीजे काफी शानदार रहे हैं। इन टेस्ट्स में गोले की रेंज, फ्लाइट स्टेबिलिटी और कंट्रोल को परखा गया, और प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक रहा। पूरी तरह तैयार होने के बाद ये रैमजेट गोले भारतीय सेना की मौजूदा 155 मिमी तोपों के साथ पूरी तरह काम करेंगे।
*किन तोपों से दागे जाएंगे ये सुपर गोले?*
सेना की योजना है कि ये गोले भारत में इस्तेमाल हो रही प्रमुख 155 मिमी तोपों के साथ इंटीग्रेट किए जाएं, जिनमें शामिल हैं-
M777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर, ATAGS (Advanced Towed Artillery Gun System) और धनुष आर्टिलरी गन। इसका मतलब है कि किसी नई तोप की जरूरत नहीं, मौजूदा सिस्टम ही और ज्यादा घातक बन जाएंगे।
*45 KM से 80 KM तक: रेंज में जबरदस्त उछाल*
भारतीय सेना के आर्टिलरी रोडमैप में सबसे बड़ी प्राथमिकता है-लंबी रेंज और ज्यादा सटीक मार। रैमजेट तकनीक से 155 मिमी गोले की मारक दूरी 80 किलोमीटर या उससे ज्यादा तक पहुंच सकती है, जबकि मौजूदा पारंपरिक तोपखाने की सीमा लगभग 45 किलोमीटर तक ही होती है। यानी दुश्मन अब पहले से कहीं ज्यादा दूर और सुरक्षित समझे जाने वाले इलाकों में भी निशाने पर होगा।
*निशाना होगा एकदम सटीक*
भविष्य में इन गोलों में एडवांस्ड गाइडेंस सिस्टम जोड़े जा सकते हैं। इससे इनका Circular Error Probable (CEP) काफी कम हो जाएगा। सीधे शब्दों में कहें तो गोला ठीक उसी जगह गिरेगा, जहां निशाना लगाया गया है। इससे दुश्मन की रेखाओं के पीछे गहराई तक सटीक हमले संभव होंगे।
*मिसाइल नहीं, फिर भी मिसाइल जैसी ताकत*
रॉकेट और मिसाइल सिस्टम के मुकाबले रैमजेट गोले का बड़ा फायदा यह है कि इन्हें किसी भी स्टैंडर्ड 155 मिमी तोप से दागा जा सकता है। इससे सेना को ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी, कम लागत और तेजी से तैनाती के विकल्प मिलते हैं। कुल मिलाकर, यह तकनीक भारत की आर्टिलरी को एक नए स्तर पर ले जाने वाली है।
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