मद्रास हाई कोर्ट ने साफ कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मौजूद है और जजों को “पवित्र गाय” की तरह नहीं माना जाना चाहिए।*
💥⚖️🇮🇳 *जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने कहा, “कोई भी इस सच्चाई से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं।*
💥⚖️ *न्यायिक भ्रष्टाचार के मामलों को हमने देखा है और ऐसे जजों को हाई कोर्ट की फुल कोर्ट समय-समय पर बाहर का रास्ता दिखाती रही है।”*
💥⚖️ *कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तब तक संभव नहीं है, जब तक बार (वकीलों के समूह) के कुछ सदस्य भ्रष्ट तत्वों का साथ न दें।*
*बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट भ्रष्ट लोगों पर लगातार कड़ी नजर रखता है और उचित कार्रवाई करता है।*
💥⚖️ *‘जज आलोचना से ऊपर नहीं’*⚖️🇮🇳
*बेंच ने टिप्पणी की, “जजों को ‘पवित्र गाय’ की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।*
*न्याय कोई छिपी हुई प्रक्रिया नहीं है।*
*इसे जनता की जांच-परख और सम्मानजनक, भले ही तीखी आलोचना का सामना करने की अनुमति होनी चाहिए।”*
⚖️🇮🇳 *क्या है मामला ?* ⚖️🇮🇳
*दरअसल, याचिकाकर्ता ने एक तमिल फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।*
*फिल्म के एक दृश्य में जज को रिश्वत लेते और नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए दिखाया गया है।*
*याचिकाकर्ता का कहना था कि यह दृश्य संविधान के खिलाफ है और न्यायपालिका की छवि खराब करता है।*
*उसने फिल्म निर्देशक बालाजी पर भारतीय न्यायिक व्यवस्था की गैर-जिम्मेदाराना आलोचना करने का आरोप भी लगाया।*
⚖️ *हालांकि कोर्ट ने माना कि फिल्म में कुछ दृश्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है, लेकिन यह भी कहा कि तमिल सिनेमा में नाटकीय प्रस्तुति आम बात है।*
⚖️*अदालत ने कलात्मक स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा, “फिल्म कला की अभिव्यक्ति है और कलाकार को कानून की सीमाओं के भीतर अपनी बात अपने तरीके से रखने की स्वतंत्रता है।”*
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